ग़ज़ल-45 अन्नदाता आपसे कब पेशवाई
अन्नदाता आपसे कब पेशवाई मांगते हैं नीम की छाया तले इक चारपाई मांगते हैं जागती रातें जो काटे हैं ठिठुर के शीत में हम छोड़ दो कीमत फसल की, रतजगाई मांगते हैं झिलमिलाती कोठियों से है हमारा वास्ता क्या हम हमारी झोपड़ी में रौशनाई मांगते हैं नोट के बंडल मुबारक हों तुम्हारी पीढ़ियों को कर्ज़ वाले बोझ से हम बस रिहाई मांगते हैं सर्जरी से तुम बुढापे में जवानी के मज़े लो दर्द से हम चीखते तो बस दवाई मांगते हैं मांगते है हम हमारा हक हमारा मेहनताना देव कब सत्ता ...