Posts

Showing posts from August, 2021

ग़ज़ल 29 क़ैद

2122    2122    21212 मज़हबी  दीवार   में   इंसान  कैद  है सोंच  की कुंठित गली नादान कैद है फ़न  मिरा नायाब है सारे  ज़माने  से शर्म  के  घूंघट  तले  पहचान  कैद  है भक्ति सेवा भाव के दिन ही चले गए दान  की  पेटी  तले  भगवान  कैद है पीठ   के  पीछे  टंगे  तस्वीर  में  बापू नोट  की  गड्डी  तले   ईमान  कैद   है अब नहीं है वक़्त रहने को महीने भर वक़्त की वंदिश में हर महमान कैद है हैं  गज़ब  बदले  नियम संसार के नए  चोर   के  आदेश  पर  दरबान  कैद  है देव  थोड़ी  सी  हवा  दे दे बगावत को हर  किसी  के  ज़हन में तूफान कैद है

ग़ज़ल - 28 राज़ बोलेगें

कभी    अंदाज़    बोलेंगे    कभी    अल्फ़ाज़    बोलेंगे मिरे   दिल   की   तलाशी   में    तुम्हारे    राज़   बोलेंगे पड़े  जो  धूल  में  कब   से  हुआ  अरसा  तुम्हारे  बिन कभी   तुम   छेड़   कर   देखो    पुराने    साज़   बोलेंगे भले  तुमने  कभी  अपना  मुझे  शहजांह  ना  समझा क़यामत  तक  मग़र  तुमको  ही  हम मुमताज़ बोलेंगे लगाया  ही  नहीं   जिसने   कभी  दिल  नाज़नीनों  से उसे   हम    इस   ज़माने   का   बड़ा   उस्ताज़   बोलेंगे कभी  होगा  मिरा  मिलना  जो  तुझसे  चंद  लम्हों का अभी   ख़ामोश ...

कविता 1

#झूठ झूठ बोलना पाप है ऐसा सिखाया गया था मुझे बड़ा हुआ तो  कुछ और नज़र आया लपलपाती जुबानें  जिन पर सनी थी  चासनी झूठ की रह रह कर लार  लपकाये जा रही थीं बह-बह के जा रही थी ये चासनी की मीठी, झूठी लार लोग खड़े थे पंक्तियों में इस लार को चाटने की अपनी बारी का इंतजार करते वो जिन्हें पसन्द न थी इस लार को चाटने की क्रिया वही तड़प रहे थे सड़क के किनारे भरी दोपहर में मारे प्यास और भूंख के कुछ तो मर गए कुछ मरने वाले थे तब जाके कुछ और  समझ मे आया मेरे वो जो कहा था बाबू जी ने वो जो कहा था माता जी ने कि झूठ बोलना पाप है वही तो सबसे बड़ा झूठ था सत्य के बाग में आज भी बीरानियत है, यहाँ कल भी ठूंठ ही ठूंठ था। #DevendraDev

गीत 8

#बातें_नई_पुरानी_लिख बातें नई पुरानी लिख भूली हुई कहानी लिख कलकल करती नदिया लिख दे ठंडी हवा सुहानी लिख बातें नई पुरानी लिख भूली हुई कहानी लिख डाली-डाली बना ठिकाना मधुर तान में छेड़ तराना करती सबको रोज दिवाना गीतों की महारानी लिख वो कोयल मस्तानी लिख बातें नई पुरानी लिख भूली हुई कहानी लिख दिनभर पीछे दौड़ लगाती लालच देकर हमें बुलाती थपकी देकर हमें सुलाती किस्सा कहती नानी लिख उसकी आंख का पानी लिख बातें नई पुरानी लिख भूली हुई कहानी लिख बात बात पर बात बनाना रोज रोज का नया बहाना गलती करके हाथ न आना बचपन की शैतानी लिख मम्मी की हैरानी लिख बातें नई पुरानी लिख भूली हुई कहानी लिख बड़े हुए तो कपट कर लिया मन के अंदर द्वेष भर लिया बचपन वाला प्यार चर लिया अब अपनी बेईमानी लिख उलझी हुई जवानी लिख बातें नई पुरानी लिख भूली हुई कहानी लिख ममता खोकर माया पायी माता खोकर आया पायी पेड़ काटकर छाया पायी अपनी ये नादानी लिख आंख का मरता पानी लिख बातें नई पुरानी लिख भूली हुई कहानी लिख #DevendraDev

गीत 7

किस  तरह  लिखूँ  उन वीरों के अतुलित साहस का किस्सा मैं किस तरह सुनाऊँ गाथाओं का स्वर्णिम    उर्जित    हिस्सा    मैं सत्तरह  बरस  का बालक जब आज़ादी   रण   में   कूद    पड़ा फूलों   सी   कोमल   काया  ले दानव  दल  से   पुरजोर   लड़ा पुस्तक  वाले   नन्हे   हाथों  में गोली   और      बारूद    थाम शोले   धाधकाये   थे  दिल  में ओठों पर था बस कृष्ण नाम हाथों   में    लेकर   के   गीता चढ़  गया  मृत्यु  की  बेदी पर उन्नीस  बरस  के  बालक  से अंग्रेज   कांपते  थे  थर - थर वह  ख़ुद  फंदे  पर झूल गया तब  मिल  पाई  ये  आज़ादी कुछ शर्म करो अब करो नहीं उसके   सपनों   की  बरबादी इन  आज़ादी  की...

गीत 6

#अंतराष्ट्रीय_युवा_दिवस ●●●●●●●●●●○●●●●●●●●●● शक्ति का आकाश हो तुम, आस हो  विश्वास  हो  तुम। तुम  अंधेरों  में  हो  दीपक, कष्ट  में   उल्लास  हो  तुम। हर  दिवाली  ईद  है  तुमसे देश  की  उम्मीद  है  तुमसे।। ऊर्जा के पुंज हो, इसको सृजन के नाम कर दो। खंडहर अज्ञानता का, विज्ञता का धाम कर दो। आपसी कटुता मिटेगी, तब सुखी इंसान होगा। विश्व में माँ भारती का, हर तरफ गुणगान होगा। बस यही ताकीद है तुमसे। देश को उम्मीद है तुमसे।। धर्म को मुद्दा बना, इंसां यहां पर लड़ रहा है। देश बर्बादी की सीढ़ी, बेबजह ही चढ़ रहा है। जातियों में बंट गए सब, दूसरों से जल रहे हैं। भ्रूण बरबादी के कितने, मजहबों में पल रहे हैं। नव सोंच की तज़दीद है तुमसे। देश को उम्मीद है तुमसे।। हर  दिवाली  ईद  है  तुमसे देश  की  उम्मीद  है  तुमसे।। *Devendra_Dev.....

गीत 5

मान बिका, सम्मान बिका  है, घर का  सब  सामान  बिका है अभी तलक कागज बिकता अब कवियों का ईमान बिका है सत्ता  की  तारीफ  करो   तब  नून, तेल  और   दाल  मिलेगा जो  जितना  गुणगान  करेगा, उसको  उतना  माल  मिलेगा भांड   छिपे   बैठे   हैं   देखों,   अब   कवियों   की  खालों   में सिक्कों   का  ईंधन  पड़ता  है  आज  कलम   की  चालों   में कविता   को    स्थान   नहीं   है  मंचों   पर   जुमले   हावी   हैं अश्रु   बहाती  कविता   बैठी   नयनों   में   सतलज-रावी   हैं जो   जितने   जुमले   फेकेंगा,  उसको  उतना  दाम मिलेगा हां  जी -  हां जी   करने   ...

गीत 4

#दर्द  कलम चल लगा के दम चल दर्द लिख, दर्द लिख मेरा लिख इसका लिख जिसका दिखे उसका लिख कलम चल दर्द लिख, दर्द लिख सूखा लिख भूँखा लिख हारी लिख बीमारी लिख बिन दवा के लाल मरा माता की लाचारी लिख कलम चल दर्द लिख,दर्द लिख खेत लिख फसलें लिख बिगड़ गयीं जो नस्लें लिख कृषकों की बर्बादी लिख तड़प रही आबादी लिख लोकतंत्र की बंदिश लिख नेता की आज़ादी लिख कलम चल दर्द लिख,दर्द लिख खुले हुए मदिरालय लिख बन्द पड़े विद्यालय लिख अनपढ़ होती जनता लिख धर्म ध्वजा को तनता लिख दीना की मजबूरी लिख मिलती नहीं मजूरी लिख लिखने को तो बहुत पड़ा पर है जो बात जरूरी लिख कलम चल दर्द लिख,दर्द लिख झूठा हर अश्वासन लिख गली-गली दुश्शासन लिख मिलती रोज दिलाशा लिख धूमिल होती आशा लिख मंहगा होता खाना लिख अच्छा कोई बहाना लिख मरियल होता हंस देख ले कौआ खाता दाना लिख कलम चल दर्द लिख,दर्द लिख धर्म भीड़ उन्मादी लिख दंगा और फसादी लिख जाति-पाँति की दूरी लिख शोषित की मजबूरी लिख पीड़ित होती अबला लिख झूंठ लिखे तो सबला लिख शांति व्यवस्था गायब है सिर पे बजता तबला लिख कलम चल दर्द लिख,दर्द लिख महंगी होती शिक्षा लिख होती नहीं परीक्षा लिख बढ़ती बेरुजगारी लिख स...

गीत - 3

_______________________________________                          #रक्षाबंधन_विशेष ============================== कहीं बहन पे प्यार बहेगा, कहीं और हैवान बनेंगे सब कुछ तो हम बन बैठे हैं जाने कब इंसान बनेंगे हांथ में राखी, नज़र बदन पर  किस दुनियाँ के वासी हो गए रिश्तों  के   सौदागर   बन   के जिस्मों के अभिलाषी हो गए दिन भर का है शोर - शराबा कल से फिर शैतान बनेंगे सब कुछ तो हम बन बैठे हैं जाने कब इंसान बनेंगे भक्षक भी अपनी बहनों से वादा  तो  करता  ही    होगा मान के सबको बहन रहेगा डींगे  तो  भरता   ही    होगा शर्म  बेंचकर  खाने वाले कब बहनों का मान बनेंगे सब कुछ तो हम बन बैठे हैं जाने कब इंसान बनेंगे पर्व नहीं ये एक दिवस का जिम्मेदारी  आस  है इसमें रेशम  की  पतली  डोरी  है रक्षा  का  विश्वास है इसमें एक ही आशा रखती बहना, भाई मेरा सम्मान बनेंगे सब  कुछ  तो  हम  बन...

ग़ज़ल 27 बांकी है

________________________________________ किसी  की  आन  बाकी  है  किसी  की  शान  बाकी  है मिरा   कुछ   भी  नहीं  बाकी  सिरफ़   ईमान  बाकी  है किसी  का  घर  किराए  पर  किसी  का  खेत है गिरबी हमारा   बिक  चुका  है  सब   यही   दालान   बाकी   है खड़े   हो   के  तिराहे  पर   पुलिसिया  ले   रहा   रिश्वत हमारी   कट  चुकी   जेबें   फ़ख़त   चालान   बाकी   है मिरी  आदत  का  हिस्सा  बन  गया  है बेबज़ह बकना बुते   का   कुछ  नहीं   मेरे   मुफ़त  का   ज्ञान  बाकी  है हमारी   ज़िंदगी   है    बन    चुकी   नवरात   का    ...

ग़ज़ल 26 उलझन

================================                                 ग़ज़ल - उलझन _________________________________________ कहीं   मंदिर   कहीं   मस्ज़िद  में  हर  इंसान  उलझा  है हुई   किससे   खता   ये  सोंचकर   भगवान   उलझा  है दिवारें  मज़हबों  की  उठ  चुकी   हैं   अब   बहुत   ऊंची मुहब्बत     मर   गयी   तन्हां   मुआँ   नादान   उलझा  है बुबाई, खाद  की  कीमत  में  सब कुछ रख दिया गिरबी छुटा  पाए  हैं  अब  तक  खेत  पर  खलिहान  उलझा है बिकी   फसलें   हमारी   कौड़ियों   के   भाव  रो -रो कर मिली  गेंहू  की  कुछ  कीमत  अभी तक धान उलझा है दशा...

ग़ज़ल 25

बस करो अब बहुत ज्यादा होशियारी हो गयी दोस्तों   से  दुश्मनी  दुश्मन  से  यारी  हो   गयी बेइमानी  और  ज्यादा  करके  क्या है फ़ायदा माल  खाया  लूट  का  तो  तोंद  भारी  हो गयी लाज़  ढकने  को  पड़े  लाले  अमीरों  के  यहां हैसियत  से  भी   ज़ियादा   देनदारी   हो  गयी भांग का  गोला कभी  देखा तलक हमने नहीं मज़हबी  उन्माद   की  हम  पे ख़ुमारी हो गयी दांव  उल्टा  भी  पड़ेगा  ये  कभी  सोंचा  न था बेबज़ह  तलवार  क्यों  अपनी  दुधारी हो गयी।। #Devendra_Dev

ग़ज़ल 24

नाज़  जिसपे  किया  वो  शख्स  ही  बेदम  निकला साज़  बदले   बहुत   आवाज़  में  बस  ग़म निकला वहम   की   धूप   में    बैठे    थे    सुखानें    ग़म   को  ताप  खुशियों  का  ही  अंदर  से बहुत कम निकला ताश    के    पत्तों    सी    संभाली    ज़िन्दगी   हमनें ताश   बिखरेंगे   नहीं    ये    महज़   भरम   निकला सुख़न  के  पल  की  थी  ख़्वाहिश  हमारे  हुज़रे में आस  का  पहलू  ही  अश्कों से भींगा नम निकला थी   हज़ारों   शिकायतें    ज़मानें    भर    से     हमें देव  करते  भी  क्या  जब  बेबफ़ा  सनम   निकला।। #Devendra_Dev

ग़ज़ल 23

आइए   तुम   भी   तमाशा   देखिए बात    से    बनते    बतासा   देखिए आमजन  आदर्श  जिनको  मानता महफ़िलों  में  उनकी  भाषा देखिए मर   रहा   है   आदमी बिन कौर के मिल   रही  झूठी   दिलाशा  देखिए धीरे-धीरे   छट   रहीं  थीं   बदलियां बढ़  चला  फिर  से  कुहासा  देखिए धन  कुबेरों  पर  न  आई आंच कोई विप्र   का   होता   खुलासा    देखिए आस अच्छे दिन की धूमिल हो गयी बढ़  चली   फिर   से  हतासा  देखिए गैस   नाले   से    यहां    बनने    लगी स्वप्न   में   इसरो  ओ  नासा    देखिए।। #Devendra_Dev

ग़ज़ल 22

-------------------------------------------------------------------                                  *छिप के बैठी है* ___________________________________________ ज़रा  सा  भी  जो  तूँ  बहका  तो  आफत  छिप  के  बैठी  है हर  इक  पागल  के  मस्तक  में  जराफ़त  छिप  के  बैठी है जिसके    चेहरे    पे    दिखती    है    मुसलसल    बत्तमीजी उसी   के  दिल  में  तो  असली  सराफ़त  छिप   के  बैठी  है तराशे    पत्थरों    को    देख,   आ    जाती    लचक    उनमें सख़्त  पत्थर  के   अंदर  भी   लताफ़त  छिप  के   बैठी   है तेरे     सदके     में  ...

ग़ज़ल 21

तेरे   रोने   से   कुछ   नहीं   होगा चैन   खोने   से  कुछ  नहीं  होगा मैल   का  ढ़ेर   छिपा  है  दिल में दाग   धोने   से  कुछ  नहीं  होगा अब  जरूरत  है  काले जादू की सिर्फ  टोने  से  कुछ  नहीं   होगा बन  के   बेशर्म  मिल  ज़माने  से  लाज़  ढ़ोने  से  कुछ  नहीं  होगा जहाँ माली ही मसल दे कलियां फूल  बोने  से  कुछ  नहीं   होगा बना  है  भीड़  का हिस्सा तूं भी तेरे   होने  से   कुछ   नहीं  होगा दर्द  जब  साथ  रहे  ख्वाबों  में 'देव'  सोने  से  कुछ  नहीं होगा।।

ग़ज़ल 20

________________________________ न  ज़मी  ख़ाली  है  न  ये  आसमां  ख़ाली बस  बचा  है  मेरे  दिल  का  मकां  ख़ाली तेरे  जाने  के  बाद  भीड़  तो  बहुत आयी उन्हें  देते  भी  क्या,  पड़ी  है  दुकां ख़ाली  सुपुर्द-ए-ख़ाक करके बैठे हैं इज़्ज़त अपनी बचा  है  मेरे  ख़ज़ाने  में  अब  गुमां ख़ाली लफ्ज़ आते ही नहीं हैं हलक से बाहर अब मचलती  रहती  है  हमारी अब जुबां ख़ाली भीड़  में  वो  नहीं  दिखते  तो घुटता है दम 'देव' खोजेंगे कहीं फिर से इक जहां ख़ाली।। ___________________________________                 देवेन्द्र यादव देव....✍️ ___________________________________