ग़ज़ल 29 क़ैद
2122 2122 21212
मज़हबी दीवार में इंसान कैद है
सोंच की कुंठित गली नादान कैद है
फ़न मिरा नायाब है सारे ज़माने से
शर्म के घूंघट तले पहचान कैद है
भक्ति सेवा भाव के दिन ही चले गए
दान की पेटी तले भगवान कैद है
पीठ के पीछे टंगे तस्वीर में बापू
नोट की गड्डी तले ईमान कैद है
अब नहीं है वक़्त रहने को महीने भर
वक़्त की वंदिश में हर महमान कैद है
हैं गज़ब बदले नियम संसार के नए
चोर के आदेश पर दरबान कैद है
देव थोड़ी सी हवा दे दे बगावत को
हर किसी के ज़हन में तूफान कैद है
💯right sir
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