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गीत-1 स्वच्छ भारत अभियान Vs पान मसाला

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__________________________________ स्वच्छ भारत अभियान Vs पान मसाला _________________________________ इधर भी थुका है, उधर भी थुका है जिधर देखता हूँ,  थुका ही थुका है दीवारें थुकी हैं, पलस्तर थुका है पतीली थुकी है, कनस्तर थुका है मसाले का इतना कहर हो गया है सुरख लाल पूरा शहर हो गया है इधर भी थुका है, उधर भी थुका है जिधर देखता हूँ,  थुका ही थुका है सरकारी दफ्तर हमें पोतना था जैसे कि ऊसर हमें जोतना था छतों में लटकते वो जाले घने थे दिवारों पे दुनियाँ के नक्शे बने थे अजंता- एलोरा सी थी चित्रकारी जहां देखा कोना वहीं पीक मारी तभी आया बाबू जो सबसे खरा था कि बाबू के मुंह में भी गुटका भरा था वो बोला कि साहब का सम्मान रखना ये सरकारी ऑफिस है ये ध्यान रखना पुताई में ना ज्यादा चूना लगाना भले बिल में कीमत को दूना लगाना बड़ा बिल बनाना वो हम डांट लेंगे बचेगा जो, आपस में हम बाँट लेंगे हमने   भी  वैसे   ही  कूंची  चलाई कहीं  पे  उठाई,  कहीं   पे   लगाई मिटे दाग तक ना, कि सब पुत गया है कि बंजर भी देखो सही जुत गया है क...

गजल 44 नई गुल्लक

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________________________________ नई गुल्लक में पड़े सिक्के पुराने निकले गमों की ओट से दुबके जो तराने निकले जिन्हें उसने तबज्जो ही न दी तमाम उम्र वही उसकी मुहब्बत के हैं दिवाने निकले जिधर देखा ही नहीं सोंच के बेजां खंडहर उसी मलबे में दबे दिल के ख़जाने निकले भरी  बारिश  में  छिपे  बैठे  रहे  कोनों  में जेठ  की  धूप  में  बालू  से  नहाने निकले कड़क  थी  धूप   तो   भिंगोते   रहे   पोशाकें अश्रु वारिश में अपनी गलती सुखाने निकले बड़े  नादान  हो  के  उसने  गुजारा  जीवन बल्ब  आड़  में  सूरज  को  छिपाने  निकले वो उसके कत्ल में शामिल थे वही कातिल थे वही अर्थी में उसकी कांधा लगाने निकले।। बड़ा मुश्किल है देव किसी का चेहरा पढ़ना रोने वाला ही कभी तुमको हंसाने निकले।।                    #देवेन्द्र_यादव_देव......✍️

ग़ज़ल-45 अन्नदाता आपसे कब पेशवाई

अन्नदाता   आपसे    कब    पेशवाई    मांगते   हैं नीम  की   छाया  तले   इक   चारपाई  मांगते  हैं जागती रातें जो  काटे  हैं  ठिठुर  के  शीत में हम छोड़  दो  कीमत फसल की, रतजगाई मांगते हैं झिलमिलाती  कोठियों  से है हमारा वास्ता क्या हम   हमारी   झोपड़ी   में    रौशनाई     मांगते   हैं नोट  के  बंडल  मुबारक  हों  तुम्हारी पीढ़ियों को कर्ज़  वाले  बोझ  से   हम  बस  रिहाई  मांगते  हैं सर्जरी   से   तुम  बुढापे  में  जवानी  के  मज़े  लो दर्द  से  हम   चीखते  तो  बस   दवाई   मांगते   हैं मांगते   है   हम   हमारा  हक   हमारा  मेहनताना देव  कब  सत्ता  ...

ग़ज़ल- 43 चुनावी साल

1222   1222  122 .................................................................. चुनावी    साल   है   राशन  मिलेगा चमकता घर गली आंगन  मिलेगा फिरेंगे रात भर गलियों में नेता अंधेरा घर भी अब रौशन मिलेगा नहीं है जिसके मुख में दांत कोई उसे भी मुफ़्त में मंजन मिलेगा ये आंखें जोहती थी बाट जिसकी चुनावी वक़्त में दर्शन मिलेगा मलाई  चापलूसों  को   मिलेगी हमे  तो  सिर्फ अश्वासन मिलेगा धरम का भी दिखाबा ख़ूब होगा कहीं रोली कहीं चंदन मिलेगा विधायक को मिलेगी कार लंबी हमें मीठा सा इक भाषन मिलेगा किसी का सूख जाएगा गला तक किसी को ज़ाम का सावन मिलेगा चुनेगी आम जनता फिर से लोहा सड़क पर ही पड़ा कुंदन मिलेगा ठगे  से  देव  वापस आओगे घर कि तुमको ताकता दर्पन मिलेगा।। ............................................................................... #Devendra_Dev ............................................................................... #Devendra_Dev

ग़ज़ल - 42 हमें कैसे बचा लेगी मुहब्बत

1222 1222 122 हमें  कैसे  बचा  लेगी  मुहब्बत कि लगता मार डालेगी मुहब्बत उसे  तो  जान  लेनी  है  हमारी दुपट्टा क्यों संभालेगी मुहब्बत अगर देखूंगा उसको सामने  से नज़र अपनी झुका लेगी मुहब्बत मुझे देखेगी छिप के खिड़कियों से नज़र हम पे ही डालेगी मुहब्बत कभी जो याद तड़पाएगी उसको तो ख्वाबों में बुला लेगी मुहब्बत नहीं डर है सज़ा का देख लेंगे सज़ा को भी सजा लेगी मुहब्बत करे गर देव चलने का जो वादा कोई  रस्ता निकालेगी मुहब्बत।।

ग़ज़ल - 41 मुहब्बत बेहिसाब बाकी है

1222 1212 22 / 112 मुहब्बत बे-हिसाब बाकी है मगर तेरा ज़बाब बाकी है लकीरें मिट गईं किताबों की अभी सूखा गुलाब बाकी है ख़ुमारी है बहुत चढ़ी मुझ पे मगर अब तक शराब बाकी है उखड़ चुके हैं ख़्वाब के तंबू बंधी  उनमें तनाब बाकी है मुझे मालूम है नहीं है तूं मगर फिर भी सराब बाकी है नहीं लगती वहाँ मजलिस कोई शहर में एक मसाब बाकी है मिले वो मुझसे रूबरू आके  अभी मेरा हिसाब बाकी है।। तनाब- तंबू में बांधी जाने वाली डोरी सराब- मृगतृष्णा, झूठा दृश्य मसाब- लोगों के इकट्ठे होने की जगह

ग़ज़ल - 40

लोग अपनी आदतों से जो बहुत रंगीन होंगे वो लिबासों को बदलने के बहुत शौक़ीन होंगे फ़न है जिनके पास नफ़रत की फसल को सींचने का आदमी होकर भी ऐसे लोग बस कोकीन होंगे आदमी बिन बात के जो चिढ़ रहे हैं दूसरों से देखना तुम उनके मुखड़े बेवजह ग़मगीन होंगे रोटियां कुछ की नहीं पचतीं बिना चुगली भिड़ाये आग भड़काने को हाज़िर हर जगह दो-तीन होंगे गर कभी तुमने किसी बेआसरा का हाथ थामा जेल में जाना पड़ेगा जुर्म सब संगीन होंगे चोरियों का डर जिन्हें हर पल सताता ही रहेगा वो बहुत विद्वान होकर भी मियां चिरक़ीन होंगे जिस घड़ी तक सीख पायेगा मुआं कानून सारे देव उस आती घड़ी तक सब नए आईन होंगे। कोकीन- नशीला पदार्थ मियां चिरक़ीन- एक ग़ज़लकार जिन्होंने अपनी ग़ज़लों की चोरी होने के डर से, अपनी ग़ज़लों का विषय पाखना (लेट्रिन) बना लिया। आईन - कानून