ग़ज़ल - 41 मुहब्बत बेहिसाब बाकी है
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मुहब्बत बे-हिसाब बाकी है
मगर तेरा ज़बाब बाकी है
लकीरें मिट गईं किताबों की
अभी सूखा गुलाब बाकी है
ख़ुमारी है बहुत चढ़ी मुझ पे
मगर अब तक शराब बाकी है
उखड़ चुके हैं ख़्वाब के तंबू
बंधी उनमें तनाब बाकी है
मुझे मालूम है नहीं है तूं
मगर फिर भी सराब बाकी है
नहीं लगती वहाँ मजलिस कोई
शहर में एक मसाब बाकी है
मिले वो मुझसे रूबरू आके
अभी मेरा हिसाब बाकी है।।
तनाब- तंबू में बांधी जाने वाली डोरी
सराब- मृगतृष्णा, झूठा दृश्य
मसाब- लोगों के इकट्ठे होने की जगह
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