गजल 44 नई गुल्लक
________________________________ नई गुल्लक में पड़े सिक्के पुराने निकले गमों की ओट से दुबके जो तराने निकले जिन्हें उसने तबज्जो ही न दी तमाम उम्र वही उसकी मुहब्बत के हैं दिवाने निकले जिधर देखा ही नहीं सोंच के बेजां खंडहर उसी मलबे में दबे दिल के ख़जाने निकले भरी बारिश में छिपे बैठे रहे कोनों में जेठ की धूप में बालू से नहाने निकले कड़क थी धूप तो भिंगोते रहे पोशाकें अश्रु वारिश में अपनी गलती सुखाने निकले बड़े नादान हो के उसने गुजारा जीवन बल्ब आड़ में सूरज को छिपाने निकले वो उसके कत्ल में शामिल थे वही कातिल थे वही अर्थी में उसकी कांधा लगाने निकले।। बड़ा मुश्किल है देव किसी का चेहरा पढ़ना रोने वाला ही कभी तुमको हंसाने निकले।। #देवेन्द्र_यादव_देव......✍️