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Showing posts from July, 2021

ग़ज़ल - 19

22  22  22 22 222 साहिल को मझधार बनाना बांकी है कश्ती को पतवार बनाना बांकी है लटक रहे ताले विद्या के मंदिर में टीचर को मक्कार बनाना बांकी है शुरू हो चुकी काटा मारी जोरों से चाकू को तलवार बनाना बांकी है महंगाई ने तेल निकाला है सब का स्कूटर को कार बनाना बांकी है जुल्म सह रहा चुप होकर निचला तबका शोषण को अधिकार बनाना बांकी है दस्त लगे हैं पहले से ही सिस्टम को डॉक्टर को बीमार बनाना बांकी है चोर लफंगे घुसे पड़े संसद में लुच्चे को सरकार बनाना बांकी है

ग़ज़ल -18

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#मीराबाई ________________________________ थी  अड़िग  विश्वास  रूपी  आस  मीरा कान्ह  के  दिल  के बहुत ही पास मीरा बाल  मन  में  किशन  की  मूरत समाई प्रीत  का  सागर  भक्ति   आकाश मीरा राह  में  तम  की  घनी  छाया पड़ी जब संकटों  में  हिम्मत  ओ  विश्वास   मीरा जिन दशाओं  में बबूल  उगते  नहीं  हो बंजरों   में  उग  चली   वो  घास   मीरा जो  कभी  बुझती  नहीं  मधु  चाटने  से कृष्ण रूपी पय की अनुपम प्यास मीरा ज़हर भी  जिस  पे नहीं करता असर हो सरल, निश्छल  प्रेम  का  आभास मीरा जगत  की  बातों  में   ना   देखी   बुराई बन  गयी  जो   प्रेम  में  उपहास   मीरा प्रीत  ही  आधार  है   केवल  जगत  में प्रीत  के  बल  बन...

ग़ज़ल - 17

2122    2122   212 _________________________ अब हमें भी आजमाकर देखिए कोइ हमसे दिल लगाकर देखिए अक्ल सरपट दौड़ती आ जायेगी वक़्त से इक चोट खाकर देखिए हैसियत कुछ भी दुःखों की है नहीं मुश्किलों में मुस्करा कर देखिए दाम की कीमत लगेगी बेअसर मान थोड़ा सा कमा कर देखिए कोशिशों में हार होती ही नहीं  दांव ख़ुद पर तो लगाकर देखिए मैल अंतस का धुलेगा नीर बिन बेबज़ह तुम खिलखिला कर देखिए चाहते हो साधु का आशीष गर 'देव' को तुम घर बुलाकर देखिए।। ___________________________       देवेन्द्र यादव 'देव'........✍️ ___________________________

ग़ज़ल -16

_____________________________ ख़्वाहिशों की वादियाँ मुरझा रहीं हैं संकटों की बदलियाँ मंडरा रहीं हैं चाहतों के बाग में सूखा पड़ा है नफ़रतों की क्यारियां लहरा रहीं हैं मांस के टुकड़े पड़े हैं हर गली में चील अपने भाग्य पर इतरा रहीं हैं गीदड़ों की टोलियों की मौज है अब सिंहनी के शावकों को खा रहीं हैं कर्म की शहनाइयाँ फूटी पड़ीं हैं ढोलकें वादों की बजती जा रहीं हैं चीख़ती इंसानियत घायल पड़ी है मंज़िलें धर्मों की उठती जा रहीं हैं 'देव' कुछ कर ले वतन के नाम पर भी झुर्रियां हर रोज बढ़ती जा रहीं हैं।। _________________________________               देवेन्द्र यादव 'देव'......✍️ __________________________________