ग़ज़ल - 19
22 22 22 22 222 साहिल को मझधार बनाना बांकी है कश्ती को पतवार बनाना बांकी है लटक रहे ताले विद्या के मंदिर में टीचर को मक्कार बनाना बांकी है शुरू हो चुकी काटा मारी जोरों से चाकू को तलवार बनाना बांकी है महंगाई ने तेल निकाला है सब का स्कूटर को कार बनाना बांकी है जुल्म सह रहा चुप होकर निचला तबका शोषण को अधिकार बनाना बांकी है दस्त लगे हैं पहले से ही सिस्टम को डॉक्टर को बीमार बनाना बांकी है चोर लफंगे घुसे पड़े संसद में लुच्चे को सरकार बनाना बांकी है