ग़ज़ल -16
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ख़्वाहिशों की वादियाँ मुरझा रहीं हैं
संकटों की बदलियाँ मंडरा रहीं हैं
चाहतों के बाग में सूखा पड़ा है
नफ़रतों की क्यारियां लहरा रहीं हैं
मांस के टुकड़े पड़े हैं हर गली में
चील अपने भाग्य पर इतरा रहीं हैं
गीदड़ों की टोलियों की मौज है अब
सिंहनी के शावकों को खा रहीं हैं
कर्म की शहनाइयाँ फूटी पड़ीं हैं
ढोलकें वादों की बजती जा रहीं हैं
चीख़ती इंसानियत घायल पड़ी है
मंज़िलें धर्मों की उठती जा रहीं हैं
'देव' कुछ कर ले वतन के नाम पर भी
झुर्रियां हर रोज बढ़ती जा रहीं हैं।।
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देवेन्द्र यादव 'देव'......✍️
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