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Showing posts from September, 2021

ग़ज़ल- 43 चुनावी साल

1222   1222  122 .................................................................. चुनावी    साल   है   राशन  मिलेगा चमकता घर गली आंगन  मिलेगा फिरेंगे रात भर गलियों में नेता अंधेरा घर भी अब रौशन मिलेगा नहीं है जिसके मुख में दांत कोई उसे भी मुफ़्त में मंजन मिलेगा ये आंखें जोहती थी बाट जिसकी चुनावी वक़्त में दर्शन मिलेगा मलाई  चापलूसों  को   मिलेगी हमे  तो  सिर्फ अश्वासन मिलेगा धरम का भी दिखाबा ख़ूब होगा कहीं रोली कहीं चंदन मिलेगा विधायक को मिलेगी कार लंबी हमें मीठा सा इक भाषन मिलेगा किसी का सूख जाएगा गला तक किसी को ज़ाम का सावन मिलेगा चुनेगी आम जनता फिर से लोहा सड़क पर ही पड़ा कुंदन मिलेगा ठगे  से  देव  वापस आओगे घर कि तुमको ताकता दर्पन मिलेगा।। ............................................................................... #Devendra_Dev ............................................................................... #Devendra_Dev

ग़ज़ल - 42 हमें कैसे बचा लेगी मुहब्बत

1222 1222 122 हमें  कैसे  बचा  लेगी  मुहब्बत कि लगता मार डालेगी मुहब्बत उसे  तो  जान  लेनी  है  हमारी दुपट्टा क्यों संभालेगी मुहब्बत अगर देखूंगा उसको सामने  से नज़र अपनी झुका लेगी मुहब्बत मुझे देखेगी छिप के खिड़कियों से नज़र हम पे ही डालेगी मुहब्बत कभी जो याद तड़पाएगी उसको तो ख्वाबों में बुला लेगी मुहब्बत नहीं डर है सज़ा का देख लेंगे सज़ा को भी सजा लेगी मुहब्बत करे गर देव चलने का जो वादा कोई  रस्ता निकालेगी मुहब्बत।।

ग़ज़ल - 41 मुहब्बत बेहिसाब बाकी है

1222 1212 22 / 112 मुहब्बत बे-हिसाब बाकी है मगर तेरा ज़बाब बाकी है लकीरें मिट गईं किताबों की अभी सूखा गुलाब बाकी है ख़ुमारी है बहुत चढ़ी मुझ पे मगर अब तक शराब बाकी है उखड़ चुके हैं ख़्वाब के तंबू बंधी  उनमें तनाब बाकी है मुझे मालूम है नहीं है तूं मगर फिर भी सराब बाकी है नहीं लगती वहाँ मजलिस कोई शहर में एक मसाब बाकी है मिले वो मुझसे रूबरू आके  अभी मेरा हिसाब बाकी है।। तनाब- तंबू में बांधी जाने वाली डोरी सराब- मृगतृष्णा, झूठा दृश्य मसाब- लोगों के इकट्ठे होने की जगह

ग़ज़ल - 40

लोग अपनी आदतों से जो बहुत रंगीन होंगे वो लिबासों को बदलने के बहुत शौक़ीन होंगे फ़न है जिनके पास नफ़रत की फसल को सींचने का आदमी होकर भी ऐसे लोग बस कोकीन होंगे आदमी बिन बात के जो चिढ़ रहे हैं दूसरों से देखना तुम उनके मुखड़े बेवजह ग़मगीन होंगे रोटियां कुछ की नहीं पचतीं बिना चुगली भिड़ाये आग भड़काने को हाज़िर हर जगह दो-तीन होंगे गर कभी तुमने किसी बेआसरा का हाथ थामा जेल में जाना पड़ेगा जुर्म सब संगीन होंगे चोरियों का डर जिन्हें हर पल सताता ही रहेगा वो बहुत विद्वान होकर भी मियां चिरक़ीन होंगे जिस घड़ी तक सीख पायेगा मुआं कानून सारे देव उस आती घड़ी तक सब नए आईन होंगे। कोकीन- नशीला पदार्थ मियां चिरक़ीन- एक ग़ज़लकार जिन्होंने अपनी ग़ज़लों की चोरी होने के डर से, अपनी ग़ज़लों का विषय पाखना (लेट्रिन) बना लिया। आईन - कानून

ग़ज़ल - 39

1222    1222    122 चुनावी    साल   है   राशन  मिलेगा चमकता घर गली आंगन  मिलेगा अँधेरे की जहां पर बस्तियां थीं दिया उस घर में भी रौशन मिलेगा किसी   के  हाथ  आएगा  दुपट्टा किसी को स्वर्ण का कंगन मिलेगा नहीं जो दे रहे थे वक़्त अब तक चुनावी वक़्त में दर्शन मिलेगा किसी  को  तो  मिलेगी  दाल  रोटी किसी  को  सिर्फ अश्वासन मिलेगा कहीं चादर चढ़ेगी मस्जिदों में  कहीं भगवान को चंदन मिलेगा विधायक को मिलेगी कार लंबी मिरी औकात है भाषन  मिलेगा किसी का सूख जाएगा गला तक किसी को ज़ाम का सावन मिलेगा चुनेगी आम जनता सिर्फ लोहा सड़क पर ही पड़ा कुंदन मिलेगा ठगे  से  देव  वापस आओगे घर कि तुमको ताकता दर्पन मिलेगा।।

ग़ज़ल - 38

किसी का यार झूठा है किसी का प्यार झूठा है किसी का है गला झूठा किसी का हार झूठा है मशीनों की तरह इंसान का दिल भी खुले साहब नहीं तो मै कहूंगा आपका औजार झूठा है बढ़ा दे काम का बोझा लगे ऑफिस ही था अच्छा नहीं जब मिल सके फुरसत गज़ब  इतवार झूठा है रहे डर हर घड़ी अपनी पुरानी टेप खुलने का जिए जो हर घड़ी डर में वो इज्जतदार झूठा है सजी इंसाफ की मंडी बिकेगा हर मुलाज़िम अब बड़ी दुष्कर गवाही है कि पैरोकार झूठा है हमें जीवन का हर अनुभव मिला है एकदम उल्टा लिखा है जो किताबों में वो जीवन सार झूठा है कमी है हर किसी की ज़िंदगी में कुछ न कुछ अबतक तुम्हारा चैन झूठा है हमारा प्यार झूठा है बना के झूठ की कोठी सजाए पोस्टर सच के समझ में देव अब आया कि ये संसार झूठा है।।

ग़ज़ल- 37

रदीफ़ - झूठा है  क़ाफ़िया - आ बह्र  - 1222   1222    1222   1222 दिलो की जीत सच्ची है गले का हार झूठा है रहे हर बात पे सहमत तो ऐसा यार झूठा है अभी पिछली दिवाली की उधारी दे नहीं पाए बढ़ा जाए उधारी को वही त्योहार झूठा है  जिसे सच को दिखाने की कभी फुरसत नहीं मिलती फंसा जो झूठ के जंजाल में अख़बार झूठा है कठिन शब्दों की वंदिश में कहानी हो गयी बोझिल ग़मों का ज़िक्र ओझल है अमां क़िरदार झूठा है दिखाए हर तरफ खुशियां नहीं हो ग़म की परछाई कहानी साफ झूठी है कहानीकार झूठा है बताए जागता है रात दिन झपकी नहीं लेता समझ जाओ गपोड़ी है कि पहरेदार झूठा है बहुत है दूर मंज़िल देव तेरी नाव खुद खे ले यहाँ मांझी के मन में खोंट है पतवार झूठा है।।

ग़ज़ल - 36

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=============================== राहतों   के  ठौर  में  ग़म  का   ठिकाना  हो  गया कल तलक जो  आशियाँ था क़ैदख़ाना हो गया जब  हक़ीक़त  सामने  आई  तो आंखे खुल गईं ज़िन्दगी  से  चोट  खाकर  मैं   सयाना  हो   गया गीत   गाए  ही  नहीं  मैंने   अभी  तक   शौकिया दर्द   में  अल्फ़ाज़  निकले  और  तराना हो गया ओढ़  कर गहरी  उदासी  चल  पड़े  हम बेख़बर देख   उनको  सामने  बस  मुस्कराना  हो   गया दूर  तक  रिश्ता  नहीं  था  जिन ग़मों की धूप से अब  हमारा  रोज़  का मिलना मिलाना हो गया चाह  लेकर  के  महल  की  छोड़ आया झोपड़ी हाथ  की  रोटी  गयी  मैं  बे-ठिकाना   हो   गया देव  ऐसी  जिम्मेदारी  ख़ुद  के  कांधे  पर...

ग़ज़ल 35 हिंदी

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============================= हमारी   शान   है    हिंदी   हमारा     मान    है    हिंदी अलंकारों   का   कानन  है  रसों  की  खान  है  हिंदी बिहारी,  सूर,  तुलसी, और  कबिरा  ने  सजाई जो वही  माँ  भारती   के  होंठ   पर   मुस्कान   है   हिंदी भगत, आज़ाद, नेताजी, न्योछावर कर गए जीवन अमर  वीरों  की  गाथा  का  अटल गुणगान है हिंदी हजारों   पुस्तकों   में   क़ैद   है  इस   देश  का दर्शन कठिन दर्शन की मंज़िल का सरल उनवान है हिंदी बहुत   समृद्ध  है  इस  देश  के  साहित्य की बगिया उसी  बगिया  के  माली  का  अडिग  ईमान है हिंदी झुकाता  देव  मस्तक  हिन्द की भाषा  के गौरव को कहानी, गीत, कविता, छंद  सबकी  जान  है...

ग़ज़ल 34

लाचारगी   मुसीबतों   का    मेज़बान    हूँ फ़िलवक़्त है वंदिश बड़ी तो बे-जबान हूँ पानी  कभी  पड़ा  नहीं  जो  फैलती  जड़ें सूखे   हुए   गुलाब   का   मैं  फूल  दान  हूँ संसार  में कभी  कहीं  मिल   पाएगा शुकूँ या  अन्तहीन  दुःख  की  कोई  दास्तान हूँ तारे  हज़ार  संग  हों   जिसके  हरेक  पल तन्हा   बना   रहा   वही   मैं   आसमान  हूँ माहौल   है   ख़ुशी   भरा   है हो रहा हल्ला ख़ाली  अभी  तलक  मैं  निरा  सूनसान हूँ।। _________________________________ Devendra Dev

ग़ज़ल - 33

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============================ शौक  कब  के  मर  चुके हैं लाज़ का पहरा नहीं है अब शिकायत है न कोई और कुछ कहना नहीं है है  जिगर  तक दर्द  मुझको घाव ये उथला नहीं है शूल  अंदर  तक धसा है जो अभी निकला नहीं है चीखते  हो  तुम  ज़रा  सी  चोट  खाकर  बेतहाशा कह  रहे  हो    तुम  हमारा  घाव  ये  गहरा  नहीं  है ज़िन्दगी   की  उलझनों  में  कट  रहा  है वक्त मेरा मैं  कहीं  ठहरूं  ये  मेरे  हाथ  का  मसला  नहीं  है मैं  जलाता  हूँ  बदन  को रोज सूरज की तपिश में चाँद  जो  ठंडक  दिलाता वो अभी निकला नहीं है खेलता  है  ये  ज़माना   आज  भी   ज़ज़्बात  से ही जाने उसका दिल है कैसा जो अभी बहला नहीं है देव सब बदला है अब तक तेरी ज़िल्लत के अलावा एक  तेरा  भाग्य  है  जो  अब  तलक  बदला...

ग़ज़ल - 32

  212       1222     212    1222 क़ाफ़िया- आँ की क़ैद वाले शब्द रदीफ़ - अपना मीत है ज़मीं अपनी यार आसमाँ अपना पांव क्यों न छोड़ेंगे रेत पे निशाँ अपना शौक़ से दिखा डाले ऐब सब ज़माने को मान कर ज़माने को ख़ास राजदां अपना ऐब की दरारों में रख के तोप बैठे वो अब बचाना मुश्किल है उनसे आशियाँ अपना वक़्त के सवालों की लग गयी झड़ी मुझपे चल रहा ज़माने में रोज़ इम्तिहाँ अपना चाँद नज़र आएगा सांझ के अंधेरे में आफ़ताब छोड़ेगा रात को गुमाँ अपना आज हो गया धोखा तुझसे एक अदना सा देव कैसे कर डाला राज़ ये बयाँ अपना।।

ग़ज़ल 31 अज़ब-गज़ब

_________________________________________ सर्कस  अज़ब-गज़ब  है  मदारी  अज़ब-गज़ब हर   शख़्स   पे  चढ़ी  है  ख़ुमारी  अज़ब-गज़ब जब   से   हक़ीम    लाया    है    नुस्ख़े   नए-नए हर   रोज   हो   रही   है   बिमारी   अज़ब-गज़ब पहुंचेंगे   हम    मुक़ाम    तक   है    राम    भरोसे चालक   भी   अनाड़ी  है  सवारी  अज़ब-गज़ब ज़र्ज़र   खड़ा   मकान   है   सामान   बिक  गया होती  नहीं   ये  कम   है   उधारी   अज़ब-गज़ब कंगाल  करके  हमको  दिख  रहा है खुश बहुत बन  ठन  के  घूमता  है  भिखारी  अज़ब-गज़ब मंदिर  के  चढ़ावे को  भी  कर  जाता  है  हज़म भगवान का  मालिक  है...

ग़ज़ल 30 जीभ

बिन हड्डियों की जीभ निकलती बहुत है ये कैंची सी हर इक बात पे चलती बहुत है ये हर शख़्स खोजता है अपना फ़ायदा यहां इंसान की फितरत है बदलती बहुत है ये कुछ दिन के बाद आंसुओं की धार बहेगी ये आशिक़ी नई है उछलती बहुत है ये कुछ दिन से जाने क्यों वो हमसे बोलता नहीं चुप्पी हमारे यार की खलती बहुत है ये सब फाइलें अमीर की मिनटों में सलटतीं पर योजना गरीब की टलती बहुत  है ये पानी तलक गरीब का तो खौलता नहीं ताक़तवारों की दाल है गलती बहुत है ये हर कोई आग दे के निकल जाता है चुपचाप ये देव की हसरत है तो जलती बहुत है ये