ग़ज़ल - 33
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शौक कब के मर चुके हैं लाज़ का पहरा नहीं है
अब शिकायत है न कोई और कुछ कहना नहीं है
है जिगर तक दर्द मुझको घाव ये उथला नहीं है
शूल अंदर तक धसा है जो अभी निकला नहीं है
चीखते हो तुम ज़रा सी चोट खाकर बेतहाशा
कह रहे हो तुम हमारा घाव ये गहरा नहीं है
ज़िन्दगी की उलझनों में कट रहा है वक्त मेरा
मैं कहीं ठहरूं ये मेरे हाथ का मसला नहीं है
मैं जलाता हूँ बदन को रोज सूरज की तपिश में
चाँद जो ठंडक दिलाता वो अभी निकला नहीं है
खेलता है ये ज़माना आज भी ज़ज़्बात से ही
जाने उसका दिल है कैसा जो अभी बहला नहीं है
देव सब बदला है अब तक तेरी ज़िल्लत के अलावा
एक तेरा भाग्य है जो अब तलक बदला नहीं है।।
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#Devendra_Dev
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