ग़ज़ल- 37
रदीफ़ - झूठा है
क़ाफ़िया - आ
बह्र - 1222 1222 1222 1222
दिलो की जीत सच्ची है गले का हार झूठा है
रहे हर बात पे सहमत तो ऐसा यार झूठा है
अभी पिछली दिवाली की उधारी दे नहीं पाए
बढ़ा जाए उधारी को वही त्योहार झूठा है
जिसे सच को दिखाने की कभी फुरसत नहीं मिलती
फंसा जो झूठ के जंजाल में अख़बार झूठा है
कठिन शब्दों की वंदिश में कहानी हो गयी बोझिल
ग़मों का ज़िक्र ओझल है अमां क़िरदार झूठा है
दिखाए हर तरफ खुशियां नहीं हो ग़म की परछाई
कहानी साफ झूठी है कहानीकार झूठा है
बताए जागता है रात दिन झपकी नहीं लेता
समझ जाओ गपोड़ी है कि पहरेदार झूठा है
बहुत है दूर मंज़िल देव तेरी नाव खुद खे ले
यहाँ मांझी के मन में खोंट है पतवार झूठा है।।
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