ग़ज़ल - 36


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राहतों   के  ठौर  में  ग़म  का   ठिकाना  हो  गया
कल तलक जो  आशियाँ था क़ैदख़ाना हो गया

जब  हक़ीक़त  सामने  आई  तो आंखे खुल गईं
ज़िन्दगी  से  चोट  खाकर  मैं   सयाना  हो   गया

गीत   गाए  ही  नहीं  मैंने   अभी  तक   शौकिया
दर्द   में  अल्फ़ाज़  निकले  और  तराना हो गया

ओढ़  कर गहरी  उदासी  चल  पड़े  हम बेख़बर
देख   उनको  सामने  बस  मुस्कराना  हो   गया

दूर  तक  रिश्ता  नहीं  था  जिन ग़मों की धूप से
अब  हमारा  रोज़  का मिलना मिलाना हो गया

चाह  लेकर  के  महल  की  छोड़ आया झोपड़ी
हाथ  की  रोटी  गयी  मैं  बे-ठिकाना   हो   गया

देव  ऐसी  जिम्मेदारी  ख़ुद  के  कांधे  पर  रखी
दोस्तों  की  शक़्ल  देखे  इक  ज़माना  हो  गया।।
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#Devendra_Dev

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