ग़ज़ल - 38
किसी का यार झूठा है किसी का प्यार झूठा है
किसी का है गला झूठा किसी का हार झूठा है
मशीनों की तरह इंसान का दिल भी खुले साहब
नहीं तो मै कहूंगा आपका औजार झूठा है
बढ़ा दे काम का बोझा लगे ऑफिस ही था अच्छा
नहीं जब मिल सके फुरसत गज़ब इतवार झूठा है
रहे डर हर घड़ी अपनी पुरानी टेप खुलने का
जिए जो हर घड़ी डर में वो इज्जतदार झूठा है
सजी इंसाफ की मंडी बिकेगा हर मुलाज़िम अब
बड़ी दुष्कर गवाही है कि पैरोकार झूठा है
हमें जीवन का हर अनुभव मिला है एकदम उल्टा
लिखा है जो किताबों में वो जीवन सार झूठा है
कमी है हर किसी की ज़िंदगी में कुछ न कुछ अबतक
तुम्हारा चैन झूठा है हमारा प्यार झूठा है
बना के झूठ की कोठी सजाए पोस्टर सच के
समझ में देव अब आया कि ये संसार झूठा है।।
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