ग़ज़ल 34

लाचारगी   मुसीबतों   का    मेज़बान    हूँ
फ़िलवक़्त है वंदिश बड़ी तो बे-जबान हूँ

पानी  कभी  पड़ा  नहीं  जो  फैलती  जड़ें
सूखे   हुए   गुलाब   का   मैं  फूल  दान  हूँ

संसार  में कभी  कहीं  मिल   पाएगा शुकूँ
या  अन्तहीन  दुःख  की  कोई  दास्तान हूँ

तारे  हज़ार  संग  हों   जिसके  हरेक  पल
तन्हा   बना   रहा   वही   मैं   आसमान  हूँ

माहौल   है   ख़ुशी   भरा   है हो रहा हल्ला
ख़ाली  अभी  तलक  मैं  निरा  सूनसान हूँ।।
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Devendra Dev

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