ग़ज़ल - 39
1222 1222 122
चुनावी साल है राशन मिलेगा
चमकता घर गली आंगन मिलेगा
अँधेरे की जहां पर बस्तियां थीं
दिया उस घर में भी रौशन मिलेगा
किसी के हाथ आएगा दुपट्टा
किसी को स्वर्ण का कंगन मिलेगा
नहीं जो दे रहे थे वक़्त अब तक
चुनावी वक़्त में दर्शन मिलेगा
किसी को तो मिलेगी दाल रोटी
किसी को सिर्फ अश्वासन मिलेगा
कहीं चादर चढ़ेगी मस्जिदों में
कहीं भगवान को चंदन मिलेगा
विधायक को मिलेगी कार लंबी
मिरी औकात है भाषन मिलेगा
किसी का सूख जाएगा गला तक
किसी को ज़ाम का सावन मिलेगा
चुनेगी आम जनता सिर्फ लोहा
सड़क पर ही पड़ा कुंदन मिलेगा
ठगे से देव वापस आओगे घर
कि तुमको ताकता दर्पन मिलेगा।।
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