ग़ज़ल- 43 चुनावी साल

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चुनावी    साल   है   राशन  मिलेगा
चमकता घर गली आंगन  मिलेगा

फिरेंगे रात भर गलियों में नेता
अंधेरा घर भी अब रौशन मिलेगा

नहीं है जिसके मुख में दांत कोई
उसे भी मुफ़्त में मंजन मिलेगा

ये आंखें जोहती थी बाट जिसकी
चुनावी वक़्त में दर्शन मिलेगा

मलाई  चापलूसों  को   मिलेगी
हमे  तो  सिर्फ अश्वासन मिलेगा

धरम का भी दिखाबा ख़ूब होगा
कहीं रोली कहीं चंदन मिलेगा

विधायक को मिलेगी कार लंबी
हमें मीठा सा इक भाषन मिलेगा

किसी का सूख जाएगा गला तक
किसी को ज़ाम का सावन मिलेगा

चुनेगी आम जनता फिर से लोहा
सड़क पर ही पड़ा कुंदन मिलेगा

ठगे  से  देव  वापस आओगे घर
कि तुमको ताकता दर्पन मिलेगा।।
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#Devendra_Dev
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#Devendra_Dev

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