ग़ज़ल - 17
2122 2122 212
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अब हमें भी आजमाकर देखिए
कोइ हमसे दिल लगाकर देखिए
अक्ल सरपट दौड़ती आ जायेगी
वक़्त से इक चोट खाकर देखिए
हैसियत कुछ भी दुःखों की है नहीं
मुश्किलों में मुस्करा कर देखिए
दाम की कीमत लगेगी बेअसर
मान थोड़ा सा कमा कर देखिए
कोशिशों में हार होती ही नहीं
दांव ख़ुद पर तो लगाकर देखिए
मैल अंतस का धुलेगा नीर बिन
बेबज़ह तुम खिलखिला कर देखिए
चाहते हो साधु का आशीष गर
'देव' को तुम घर बुलाकर देखिए।।
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देवेन्द्र यादव 'देव'........✍️
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