ग़ज़ल -18
#मीराबाई
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थी अड़िग विश्वास रूपी आस मीरा
कान्ह के दिल के बहुत ही पास मीरा
बाल मन में किशन की मूरत समाई
प्रीत का सागर भक्ति आकाश मीरा
राह में तम की घनी छाया पड़ी जब
संकटों में हिम्मत ओ विश्वास मीरा
जिन दशाओं में बबूल उगते नहीं हो
बंजरों में उग चली वो घास मीरा
जो कभी बुझती नहीं मधु चाटने से
कृष्ण रूपी पय की अनुपम प्यास मीरा
ज़हर भी जिस पे नहीं करता असर हो
सरल, निश्छल प्रेम का आभास मीरा
जगत की बातों में ना देखी बुराई
बन गयी जो प्रेम में उपहास मीरा
प्रीत ही आधार है केवल जगत में
प्रीत के बल बन गयी इतिहास मीरा
जोगिनी बन प्रीत का मतलब बताया
'देव' अतुलित प्रेम की थी न्यास मीरा।।
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देवेन्द्र देव........✍️
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