ग़ज़ल -18

#मीराबाई
________________________________
थी  अड़िग  विश्वास  रूपी  आस  मीरा
कान्ह  के  दिल  के बहुत ही पास मीरा

बाल  मन  में  किशन  की  मूरत समाई
प्रीत  का  सागर  भक्ति   आकाश मीरा

राह  में  तम  की  घनी  छाया पड़ी जब
संकटों  में  हिम्मत  ओ  विश्वास   मीरा

जिन दशाओं  में बबूल  उगते  नहीं  हो
बंजरों   में  उग  चली   वो  घास   मीरा

जो  कभी  बुझती  नहीं  मधु  चाटने  से
कृष्ण रूपी पय की अनुपम प्यास मीरा

ज़हर भी  जिस  पे नहीं करता असर हो
सरल, निश्छल  प्रेम  का  आभास मीरा

जगत  की  बातों  में   ना   देखी   बुराई
बन  गयी  जो   प्रेम  में  उपहास   मीरा

प्रीत  ही  आधार  है   केवल  जगत  में
प्रीत  के  बल  बन  गयी  इतिहास मीरा

जोगिनी  बन  प्रीत  का  मतलब बताया
'देव' अतुलित  प्रेम  की  थी  न्यास मीरा।।
___________________________________
         देवेन्द्र देव........✍️
___________________________________

Comments