गीत 4

#दर्द

 कलम चल
लगा के दम चल
दर्द लिख, दर्द लिख
मेरा लिख
इसका लिख
जिसका दिखे
उसका लिख
कलम चल
दर्द लिख, दर्द लिख

सूखा लिख
भूँखा लिख
हारी लिख
बीमारी लिख
बिन दवा के लाल मरा
माता की लाचारी लिख
कलम चल
दर्द लिख,दर्द लिख

खेत लिख
फसलें लिख
बिगड़ गयीं जो
नस्लें लिख
कृषकों की बर्बादी लिख
तड़प रही आबादी लिख
लोकतंत्र की बंदिश लिख
नेता की आज़ादी लिख
कलम चल
दर्द लिख,दर्द लिख

खुले हुए मदिरालय लिख
बन्द पड़े विद्यालय लिख
अनपढ़ होती जनता लिख
धर्म ध्वजा को तनता लिख
दीना की मजबूरी लिख
मिलती नहीं मजूरी लिख
लिखने को तो बहुत पड़ा पर
है जो बात जरूरी लिख
कलम चल
दर्द लिख,दर्द लिख

झूठा हर अश्वासन लिख
गली-गली दुश्शासन लिख
मिलती रोज दिलाशा लिख
धूमिल होती आशा लिख
मंहगा होता खाना लिख
अच्छा कोई बहाना लिख
मरियल होता हंस देख ले
कौआ खाता दाना लिख
कलम चल
दर्द लिख,दर्द लिख

धर्म भीड़ उन्मादी लिख
दंगा और फसादी लिख
जाति-पाँति की दूरी लिख
शोषित की मजबूरी लिख
पीड़ित होती अबला लिख
झूंठ लिखे तो सबला लिख
शांति व्यवस्था गायब है
सिर पे बजता तबला लिख
कलम चल
दर्द लिख,दर्द लिख

महंगी होती शिक्षा लिख
होती नहीं परीक्षा लिख
बढ़ती बेरुजगारी लिख
सत्ता की मक्कारी लिख
धूमिल होती आशा लिख
युवाओं की हतासा लिख
लंबे-लंबे भाषण लिख दे
होता रोज तमाशा लिख
कलम चल
दर्द लिख,दर्द लिख

शेष क्रमशः...........
#Devendra_Dev

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