ग़ज़ल 26 उलझन

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                                ग़ज़ल - उलझन
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कहीं   मंदिर   कहीं   मस्ज़िद  में  हर  इंसान  उलझा  है
हुई   किससे   खता   ये  सोंचकर   भगवान   उलझा  है

दिवारें  मज़हबों  की  उठ  चुकी   हैं   अब   बहुत   ऊंची
मुहब्बत     मर   गयी   तन्हां   मुआँ   नादान   उलझा  है

बुबाई, खाद  की  कीमत  में  सब कुछ रख दिया गिरबी
छुटा  पाए  हैं  अब  तक  खेत  पर  खलिहान  उलझा है

बिकी   फसलें   हमारी   कौड़ियों   के   भाव  रो -रो कर
मिली  गेंहू  की  कुछ  कीमत  अभी तक धान उलझा है

दशा  अब  तक  वही  खेतों  की  बैलों की, किसानों की
हुआ   जारी    हज़ारों   बार    पर    फ़रमान   उलझा   है

न   जाने   कब   हमारी   चीख़   उन  तक  पहुंच  पाएगी
भरोसा  मर  चुका  कब  का  मगर  अभिमान  उलझा है

मकानों  का  किराया  इस  कदर  बढ़ता  गया   ज़ालिम
निकल  आये   वहां  से  हम  मगर   सामान   उलझा   है

बदन   पर   बढ़   चले   हैं   दाग - धब्बे  धूप   के   कारण
कमीजें  फट  चुकीं  कब  की फ़ख़त बनियान उलझा है

बग़ावत   रोक   पाना   देव   अब   मुश्किल  बहुत  होगा
निकल  आयीं  हैं   शमशीरें  महज़   ऐलान   उलझा    है।।
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