ग़ज़ल 27 बांकी है
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किसी की आन बाकी है किसी की शान बाकी है
मिरा कुछ भी नहीं बाकी सिरफ़ ईमान बाकी है
किसी का घर किराए पर किसी का खेत है गिरबी
हमारा बिक चुका है सब यही दालान बाकी है
खड़े हो के तिराहे पर पुलिसिया ले रहा रिश्वत
हमारी कट चुकी जेबें फ़ख़त चालान बाकी है
मिरी आदत का हिस्सा बन गया है बेबज़ह बकना
बुते का कुछ नहीं मेरे मुफ़त का ज्ञान बाकी है
हमारी ज़िंदगी है बन चुकी नवरात का चंदा
रसीदें कट गयीं कब की अभी भुगतान बाकी है
मुहब्बत की बिमारी इस क़दर हावी हुई हम पे
ज़िगर में दर्द है बेहद फ़ख़त यरकान बाकी है
बिना देखे - सुने कैसी मुहब्बत देव की तूनें
जुदाई हो चुकी कब की अभी उनवान बाकी है।।
#Devendra_Dev
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यरकान = पीलिया रोग (जॉन्डिस)
उनवान = जान-पहचान (परिचय)
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