ग़ज़ल - 10

                     

ग़ज़ल
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मुश्किलों  को  देखकर  क्या  मुस्कराना  छोड़  दें
कंकड़ों  का  डर  लगा  क्या  दाल  खाना छोड़ दें

रेत  में  गाड़ी  फंसी  धक्के  पे  धसती  जा   रही
देह  है  कमज़ोर  तो  क्या  बल  लगाना  छोड़  दें

हाल  कबिरा  का  सुना  हो  क्या  बताना  चाहते
मौत  से  डर  जाय  क्या  सबको  जगाना छोड़ दें

मुफ़लिसी  का  दौर  है  भोजन  नहीं  है  पेट भर
द्वार  के  महमान  को  क्या जल पिलाना छोड़ दें

मानते   हैं   दुश्मनों   के   घर  बनें  हैं  उस  गली
दुश्मनों  के  डर  से  क्या  उस  राह जाना छोड़ दें

'देव'  है  गहरा  तिमिर   इन   आंधियो की रात में
आंधियों  के  डर  से क्या दीपक जलाना छोड़ दें।।
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                       देवेन्द्र यादव 'देव'.....🖋️

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