ग़ज़ल-13

बह्र- 2122  2122  2122  212
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अब लंगोटा बिक चुका है क्या करेगा आमजन
आम जैसा चुंस चुका है क्या करेगा आमजन

ज्यों दुल्हनियां भाग जाए भाँवरें लेने के बाद
दिलजले सा दिल फ़ुका है क्या करेगा आमजन

महकते वादों के गुलशन में चले थे घूंमने
पीठ में भाला भुका है क्या करेगा आमजन

नांच होता लूट का इस देश में चिर काल से
भाग्य पर अपने थुका है क्या करेगा आमजन

सौंप दी जिसको कमानें नौसिखा निकला वही
हर जगह मस्तक झुका है क्या करेगा आमजन

फ़िकर में कटती हैं रातें क्या बिकेगा कल सुबह
तेज चलता धुकधुका है क्या करेगा आमजन

रूठ कर बैठी सियासत रास्तों के दरमियां
जीत का रस्ता रुका है क्या करेगा आमजन

सैनिकों पर तीर बरसाता ख़ुद ही का रहनुमा
शीश पे आ शर ठुका है क्या करेगा आमजन

सूझता कुछ भी नहीं मस्तक भरा है खीझ से
'देव' चोटी तक पका है क्या करेगा आमजन
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      देवेन्द्र यादव 'देव'......✍️
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