ग़ज़ल - 14 गालियाँ

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कपकपाते  शीत  में  हैं  धूप जैसी गालियाँ
जिसके जैसे कारनामे उसको वैसी गालियाँ

आदमी जब हरकतों से बाज आता ही नहीं
हरकतों  को छोडने  में हैं  हितैसी  गालियाँ

चार जन जब लड़ रहे हो बेबजह की बात पर
आग भड़काती  भयंकर  तेल  जैसी  गालियाँ

गालियाँ  भी  वेज  ओ ना-वेज  होती  हैं यहाँ
आदमी ने सीख  लीं हैं  कैसि  कैसी  गालियाँ

जब जिगर में क्रोध वाली खुजलियाँ उठने लगे
जिगर को ठंडक दिलातीं शीत पय सी गालियाँ

आदमी  की  जिंदगी  को  नाश  करता है नशा
'देव' होती  हैं  नशीली  तीव्र  मय  सी गालियाँ।।
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                 देवेन्द्र यादव देव .......✍️
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