ग़ज़ल - 15 - चापलूसी

_____________________________
                चापलूसी
_____________________________
बेंच   कर   ईमान   आती   चापलूसी
बैठ   कर   रबड़ी   उड़ाती  चापलूसी

कामचोरी  करके  भी  ईनाम मिलता
धूप   में   छाया   दिलाती   चापलूसी

काम  कुछ  होता  नहीं  है  अकेले में
भीड़   में   नारे    लगाती   चापलूसी

मुफ़्त  की  खा के कमाई फूल जाती
स्वर्ण  जैसी   चमचमाती   चापलूसी

मान  मर्यादा  नहीं  कुछ काम का है
मुश्किलों  में  काम  आती चापलूसी

फाइलों  से  कुछ  नहीं होता यहाँ पे
सड़क  का  ठेका दिलाती चापलूसी

वीरता से कुछ  नहीं होता  यहाँ अब
रंक   को   राजा   बनाती  चापलूसी

चापलूसी  ही  दवा  है  हर मरज की
'देव' तुझको क्यों न आती चापलूसी।।
_____________________________
         देवेन्द्र यादव 'देव'.......✍️
_____________________________

Comments