ग़ज़ल - 15 - चापलूसी
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चापलूसी
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बेंच कर ईमान आती चापलूसी
बैठ कर रबड़ी उड़ाती चापलूसी
कामचोरी करके भी ईनाम मिलता
धूप में छाया दिलाती चापलूसी
काम कुछ होता नहीं है अकेले में
भीड़ में नारे लगाती चापलूसी
मुफ़्त की खा के कमाई फूल जाती
स्वर्ण जैसी चमचमाती चापलूसी
मान मर्यादा नहीं कुछ काम का है
मुश्किलों में काम आती चापलूसी
फाइलों से कुछ नहीं होता यहाँ पे
सड़क का ठेका दिलाती चापलूसी
वीरता से कुछ नहीं होता यहाँ अब
रंक को राजा बनाती चापलूसी
चापलूसी ही दवा है हर मरज की
'देव' तुझको क्यों न आती चापलूसी।।
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देवेन्द्र यादव 'देव'.......✍️
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