ग़ज़ल- 2
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फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
2122 2122 2122
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दंभ का नाटक रचा कर क्या करोगे
पुतलियां जी भर नचा कर क्या करोगे
मर गया मांझी तड़प कर भूंख से ही
महज़ पतवारें बचा कर क्या करोगे
हो गयी नीलाम इज्जत महफिलों में
मान का हल्ला मचा कर क्या करोगे
खा गए राशन गरीबों के घरों का
दाल रोटी को पचा कर क्या करोगे
लाज गिरबी रख सियासत में घुसे थे
शर्म से मस्तक लचा कर क्या करोगे
जम गईं परतें कवक की मन तलक में
धूप में खुद को तचा कर क्या करोगे।।
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#देवेन्द्र_यादव_देव.......✍️
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