ग़ज़ल - 3 मज़दूर

*ग़ज़ल~मज़दूर*
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बह्र- 2122 2122 2122 212

रोटियों  की  फ़िक्र  में  दिन-रात  मैं  चलता  रहा
हड्डियों   को  तोड़   डाला  भूंख  से  जलता  रहा

आशियाना  बन  न  पाया   फाइलें   चलती  रहीं
पेड़  की  छाया  तले  ही  अब  तलक पलता रहा

सैकड़ों   राजा-वज़ीरों    के    हुज़ूम   आते    रहे
हर   कोई  बातों  के  लच्छों  से  हमें  छलता  रहा

कम्बलों  की  खेप  आके  बाबुओं  में   बंट   गयी
कपकपाती   ठंड  में   यूं   ही   पड़ा   गलता  रहा

बिन  सिफारिश  के  हकीमों ने न देखी नब्ज़ तक
मर   गए  परिवार   वाले   हाँथ   मैं   मलता   रहा

भोर   में  उम्मीद  का  सूरज   निकलता  रोज  था
शाम  तक   थक  हार  के  बेफ़ायदा   ढ़लता  रहा

आस  की  डोरी   न  छोड़ी   गुरबतों  के खौफ़ से
दामची  की   बेरुख़ी  का  गम  सदा खलता रहा

सब  हुआ  इस  देश  में  मुझको  हँसाने  के सिवा
रोटियां   पाने  का  मेरा  काम   ही   टलता   रहा।।
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                     #देवेन्द्र_यादव_देव.......✍️

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