ग़ज़ल - 5


2122   2122   2122  2122

ये मुहब्बत उमर भर देकर तड़प चलती रहेगी
खण्डहर में भी शमां लहरा के ही जलती रहेगी

लौटकर इन वादियों में आएंगे वो  फिर कभी तो
कब तलक ये आस झूठी हृदय में पलती रहेगी

अब तलक उनसे मिलन की रात तो आयी नहीं है
आगमन की वो घड़ी टलती रही टलती रहेगी

आ रही है ज़िन्दगी की सांझ आखिर दौड़कर के
चाहतों की दोपहर लम्हों में बंट ढलती रहेगी

'देव' वो रुख़सत हुआ था बेरुख़ी की ओट लेकर
ये मुहब्बत साहिलों पे बैठ कर मलती रहेगी।।
                   
                   देवेन्द्र यादव 'देव'......✍️

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