ग़ज़ल - 6 दोस्ती
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ग़ज़ल - दोस्ती
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ये ज़माना दोस्ती का इस कदर मुहताज़ है
साज़ है चारो तरफ़, जानें कहाँ आवाज़ है
हाँ में हाँ कर झूठ अब रबड़ी-मलाई खा रहा
सत्य है गूंगा हुआ मायूस हर अल्फ़ाज़ है
दोस्ती भामा निभाया प्राण का बलिदान दे
दोस्तों के पेट में ही चल रही मिकराज़ है
रोटियों से जोड़ होता, दाम देकर तोड़िये
दोस्ती में दाम ही सबसे बड़ी अमराज़ है
मान अपना गलत जिसको बोल डाले सामने
'देव' तुझसे बहुत ज्यादा अब वही नाराज़ है।।
~देवेन्द्र_यादव_देव.......✍️
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अमराज़ = बीमारी
मिकराज़ = कैंची
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