ग़ज़ल- 7

2122    2122  2122  212

झोपड़ी सहमी कभी जब महल की हुंकार से
नाव कर बैठी बग़ावत धार बिच पतवार से

जब अमीरी बे-कलक़ हो लूटने सबको लगी
ग़ुरबतों ने छेड़ डाली जंग-ए-हक़ सरकार से

लांघ के दहलीज़ घर की हाँथ में तलवार ले
युद्ध करती नारियाँ भी सत्य के हथियार से

कुक्करों के झुंड भी ना रोक पाते रास्ते
कांपती वीरानियाँ भी सिंह के यलगार से

चल अकेला सिंह माफ़िक क्रांति के इस रास्ते
शत्रु सिर पर पैर रख भागेगा फिर पैकार से

'देव' तेरा धैर्य तेरा बल तेरा हथियार है
फिर डरे क्यों मन में अपने हक़ की इस तक़रार से।।
           देवेन्द्र यादव 'देव'....✍️

Comments