ग़ज़ल - 8

2122  2122  2122
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क्या   हुआ  जो  ना  हुई  उनकी  रज़ा  है
एक  तरफा  प्यार   का  अपना   मज़ा  है

फिकर ना रहती कभी उसको ख़र्च की
मस्त  आशिक़  आशिक़ों   का  मुर्तजा  है

चाहतों   को  भी  कभी  ना    जान   पाए
बेकदर   की   बेरुखी   की   ये   ज़ज़ा  है

चाँद   बैठा    दूर    बाहों   में    न   आता
चांदनी    से    झिलमिलायी  ये  फ़ज़ा  है

आशिकों  को  डर  सताता  मार  का बस
बाप   से   बचते   रहें    ये   इल्तज़ा    है

प्यार  है जब  तक  छिपा चलता रहेगा
प्यार   के   इज़हार   की  अपनी सज़ा है

'देव'   ऐसे   इश्क़   से   तुम   दूर   रहना
इस तरह के  इश्क़   का   डंका  बजा   है।।
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रज़ा - सहमति,  ज़ज़ा - बदला
फ़ज़ा - वातावरण   इल्तज़ा - गुजारिश
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        देवेन्द्र यादव 'देव'.........✍️

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