ग़ज़ल 30 जीभ

बिन हड्डियों की जीभ निकलती बहुत है ये
कैंची सी हर इक बात पे चलती बहुत है ये

हर शख़्स खोजता है अपना फ़ायदा यहां
इंसान की फितरत है बदलती बहुत है ये

कुछ दिन के बाद आंसुओं की धार बहेगी
ये आशिक़ी नई है उछलती बहुत है ये

कुछ दिन से जाने क्यों वो हमसे बोलता नहीं
चुप्पी हमारे यार की खलती बहुत है ये

सब फाइलें अमीर की मिनटों में सलटतीं
पर योजना गरीब की टलती बहुत 
है ये

पानी तलक गरीब का तो खौलता नहीं
ताक़तवारों की दाल है गलती बहुत है ये

हर कोई आग दे के निकल जाता है चुपचाप
ये देव की हसरत है तो जलती बहुत है ये

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